भारतीय संविधान की प्रस्तावना
- प्रश्न 41 भारतीय संविधान की प्रस्तावना किस वाक्यांश से शुरू होती है -
CET 2024 (12th Level) 22 October Shift-I -
- (अ) प्रभु के नाम के साथ .....
- (ब) भारत एक प्रभुत्वसंपन्न, समाजवादी .....
- (स) भारत के सभी नागरिकों की सुरक्षा .....
- (द) “हम भारत के लोग” .....
उत्तर : “हम भारत के लोग” .....
व्याख्या :
संविधान की प्रस्तावना “हम भारत के लोग” वाक्यांश से शुरू होती है, जो संप्रभुता और लोकतंत्र को दर्शाता है।
- प्रश्न 42 भारत के संविधान की प्रस्तावना में शब्द “Socialist” (समाजवादी) और “Secular” (धर्मनिरपेक्ष) किस संशोधन द्वारा जोड़े गये -
CET 2024 (12th Level) 23 October Shift-II -
- (अ) 44वाँ संशोधन
- (ब) 46वाँ संशोधन
- (स) 41 वाँ संशोधन
- (द) 42वाँ संशोधन
उत्तर : 42वाँ संशोधन
व्याख्या :
1976 में इंदिरा गांधी की सरकार के दौरान 42वें संविधान संशोधन के तहत संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवादी’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द शामिल किए गए थे।
- प्रश्न 43 प्रस्तावना से संबंधित निम्नलिखित में से कौनसे कथन गलत हैं? नीचे दिए गए कूट में से सही उत्तर का चयन कीजिए-
(A) सज्जन सिंह मामलें में, सुप्रीम कोर्ट ने मांना कि प्रस्तावना संविधान निर्माताओं के दिमाग की कुंजी थी।
(B) बेरुबारी मामले में, सुप्रीम क़ोर्ट ने कहा कि प्रस्तावना में “गहन विचार-विमर्श” की छाप थी, “सटीकता से चिन्हित” थी और संविधान के निर्माताओं ने इसे महत्त्व दिया था।
(C) गोलक नाथ मामले में, यह देखा गया कि प्रस्तावना “संविधान की आत्मा-शाश्वत और अपरिवर्तनीय” थी।
(D) केशवानंद भारती मामले मैं, न्यायालय ने कहा कि प्रस्तावना न केवल संविधान का बहुत बड़ा हिस्सा है, बल्कि “अत्यंत महत्त्वपूर्ण है और संविधान को प्रस्तावना में व्यक्त भव्य और महान दृष्टि के प्रकाश में पढ़ा और व्याख्या किया जाना चाहिए”।
कूट -
RPSC EO/RO Re-Exam - 2022 -
- (अ) (C) और (D) दोनों गलत हैं
- (ब) (B) और (C) दोनों गलत हैं
- (स) (A), (B) और (D) गलत हैं
- (द) (A) और (B) दोनों गलत हैं
उत्तर : (A) और (B) दोनों गलत हैं
व्याख्या :
सज्जन सिंह बनाम राजस्थान (1965) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्तावना को संविधान निर्माताओं के विचारों की कुंजी नहीं माना था। बल्कि, यह बात बेरुबारी यूनियन मामला (1960) में कही गई थी।
बेरुबारी मामला (1960) में सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्तावना को संविधान का भाग मानने से इनकार किया था और इसे केवल उद्देश्य-प्रकाशक (Objective Illuminator) माना था।
गोलक नाथ मामला (1967) में सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्तावना को संविधान की आत्मा बताते हुए इसे “शाश्वत और अपरिवर्तनीय” माना था।
केशवानंद भारती मामला (1973) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रस्तावना संविधान का बहुत महत्त्वपूर्ण हिस्सा है और इसे संविधान की व्याख्या में ध्यान में रखा जाना चाहिए। इस फैसले ने प्रस्तावना को संविधान का अभिन्न अंग माना।
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