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मृदा या मिट्टी

p>भूमी की सबसे ऊपरी परत जो पेड़-पौधों के उगने के लिए आवश्यक खनिज आदि प्रदान करती है, मृदा या मिट्टी कहलाती है।

भिन्न स्थानों पर भिन्न प्रकार की मिट्टी पाई जाती है इनकी भिन्नता का सम्बन्ध वहां की चट्टानों की सरंचना, धरातलीय स्वरूप, जलवायु, वनस्पति आदि से होता है।

मिट्टी के अध्ययन के विज्ञान को मृदा विज्ञान यानी पेडोलोजी कहा जाता है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् ने भारत की मिट्टियों का विभाजन 8 प्रकार में किया है -

India Soil

1. जलोढ़ मिट्टी

जलोढ़ मिट्टी को दोमट और कछार मिट्टी के नाम से भी जाना जाता है। नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी को जलोढ़ मिट्टी कहते हैं। यह मिट्टी देश के 40 प्रतिशत भागों में लगभग 15 लाख वर्ग किमी. क्षेत्र में विस्तृत है। यह तटीय मैदानों व डेल्टा प्रदेशों में अधिक मिलती है।

इसे बांगर व खादर में विभग किया जाता है।

बांगर - यह प्राचीन जलोढ़क (नदियों द्वारा लाई गई पुरानी मिट्टी) है। इनकी उर्वरता कम होती है इसलिए इनकी उर्वरता बनाए रखने के लिए उर्वरकों की आवश्यकता होती है।

खादर - यह नवीन जलोढ़ है यानी प्रत्येक साल बाढ़ द्वारा लाई गई मिट्टी है। यह बांगर की अपेक्षा अधिक उपजाऊ होती है।

जलोढ़ मिट्टीयों में पोटाश, फास्फोरिक अम्ल, चूना व कार्बनिक तत्व अधिक होते हैं। वहीं नाइट्रोजन व ह्यूमस की कमी होती है।

शुष्क क्षेत्रों में इस प्रकार की मिट्टी में लवणीय और क्षारीय गुण भी पाए जाते हैं, जिन्हें स्थानीय भाषाओं में रेह, कल्लर या धूर नामों से भी जाना जाता है।

जलोढ़ मिट्टी धान, गेहूं, गन्ना, दलहन, तिलहन आदि की खेती के लिए उपयुक्त है।

2. काली मिट्टी

इसे रेगुर मिट्टी या कपासी मिट्टी भी कहा जाता है। इसे अंतर्राष्ट्रीय रूप से उष्ण कटिबंधीय चरनोजम भी कहा जाता है। इसका रंग काला होता है तथा यह कपास की खेती हेतु सबसे उपयुक्त मिट्टी है।

इसका निर्माण ज्वालामुखी लावा के अपक्षयण व अपरदन से हुआ है। मैग्नेटाइट, लोहा, एल्यूमिनियम सिलिकेट, ह्यूमस आदि की उपस्थिति के कारण इसका रंग काला हो जाता है। इसमें नमी धारण करने की बेहतर क्षमता होती है। इसमें कपास, मोटे अनाज, तिलहन, सूर्यमुखी, सब्जियां, खट्टे फल आदि की कृषि होती है।

इस प्रकार की मिट्टी का सर्वाधिक विस्तार महाराष्ट्र में है। जहां इसे दक्कन ट्रैप से बनी मिट्टी भी कहा जाता है।

इस मिट्टी में लोहा, चूना, पोटाश, एल्यूमिनियम, कैल्शियम व मैग्नेशियम कार्बोनेट प्रचुर मात्रा में होता है, जबकि नाइट्रोजन, फास्फोरस व कार्बनिक तत्वों की कमी होती है।

प्रायद्वीपीय काली मिट्टी को सामान्यतः तीन भागों में बांटा जाता है -

छिछली काली मिट्टी - इसका निर्माण दक्षिण में बेसाल्ट ट्रैपों से हुआ है।

मध्यम काली मिट्टी - इसका निर्माण बेसाल्ट, शिस्ट, ग्रेनाइट, नीस आदि चट्टानों की टूट-फूट से हुआ है।

गहरी काली मिट्टी - यही वास्तविक काली मिट्टी है, जिसका निर्माण ज्वालामुखी के उद्गार से हुआ है।

3. लाल मिट्टी

सामान्य से लेकर भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में प्राचीन क्रिस्टलीय शैलों के अपक्षयण व अपरदन (चट्टानों की कटी हुई मिट्टी)से इसका निर्माण हुआ है।यह मिट्टी अधिकतर दक्षिणी भारत में मिलती है। इसका लाल रंग लौह आॅक्साइड की उपस्थिति के कारण है। यह अपेक्षाकृत कम उपजाऊ मिट्टी है तथा इसमें सिंचाई की आवश्यकता होती है। ये मिट्टी लगभग पूरे तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, महाराष्ट्र और उड़ीसा के कुछ हिस्सों में पायी जाती है। ऊंचे क्षेत्रों में यह बाजरा, मूंगफली और आलू के उपयुक्त है, वहीं निम्न क्षेत्रों में यह चावल, रागी, तंबाकू और सब्जियों के लिए उपयुक्त है।

इस मिट्टी में घुलनशील लवणों की पर्याप्तता होती है, परन्तु फास्फोरिक अम्ल, कार्बनिक तत्व, जैविक पदार्थ, चूना व नाइट्रोजन की कमी पाई जाती है।

4. लैटेराइट मिट्टी

इन मृदाओं का अध्ययन सर्वप्रथम एफ. बुकानन द्वारा 1905 में किया गया। यह मुख्यतः प्रायद्वीपीय भारत के पठारों के ऊपरी भागों में विकसित हुई। 200 सेमी. से अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में चूना व सिलिका के निक्षालन से इसकी उत्पत्ति होती है। इस प्रकार की मिट्टी में सामान्यतः झाड़ व चारागाह होते हैं, परन्तु उर्वरक का उपयोग कर चावल, रागी, काजू आदि की उपज संभव है। इस मिट्टी में लौह-आॅक्साइड व एल्यूमिनियम आॅक्साइड की प्रचुरता होती है, परन्तु नाइट्रोजन, फास्फोरिक अम्ल, पोटाश, चूना और कार्बनिक तत्वों की कमी मिलती है। ये मिट्टी आमतौर पर केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उड़ीसा और असम के पहाड़ी इलाकों में पायी जाती है।

कणों के आकार के आधार पर लैटेराइट मिट्टियों को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है।

भूजलीय लैटैराइट - इस प्रकार की मिट्टियों का निर्माण भूगर्भीय जल की सहायता से होता है।

गहरी लाल लैटेराइट - इसमें लौह-आॅक्साइड और पोटाश की मात्रा अधिक होती है।

श्वेत लैटेराइट - इसमें कैओलिन की अधिकता के कारण मिट्टी का रंग सफेद होता है।

5. पर्वतीय मिट्टी

इसे वनीय मृदा भी कहा जाता है। इस प्रकार की मिट्टियां हिमालय की घटियों में ढलानों पर पायी जाती है। यह निर्माणाधीन मिट्टी है। इनका पूर्ण रूप से अध्ययन नहीं हुआ है। ह्यूमस की अधिकता के कारण यह अम्लीय गुण रखती है। इस प्रकार की मिट्टी में चाय, काॅफी, मसाले एवं उष्णकटिबंधीय फलों की खेती संभव है। इस प्रकार की मिट्टी जम्मू-कश्मीर से लेकर अरूणाचल प्रदेश तक के पर्वतीय क्षेत्र में मिलती है।

6. शुष्क और मरूस्थलीय मिट्टियां

इस प्रकार की मिट्टी अरावली पर्वत और सिन्धु घाटी के मध्यवर्ती क्षेत्रों विशेषतः पश्चिमी राजस्थान, उत्तरी गुजरात, दक्षिणी हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मिलती है। इस मिट्टी में बालू की मात्रा पायी जाती है व ज्वार जैसे मोट अनाजों की खेती के लिए उपयुक्त है। इन मिट्टियों में घुलनशील लवणों एवं फास्फोरस की मात्रा अधिक होती है जबकि कार्बनिक तत्वों एवं नाइट्रोजन की कमी होती है।

7. लवणीय व क्षारीय मिट्यिां

यह एक अंतः क्षेत्रीय मिट्टी है, जिसका विस्तार सभी जलवायु प्रदेशों में है। यह मिट्टी राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, तमिलनाडु के शुष्क व अर्द्धशुष्क प्रदेशों में विस्तृत है।

सोडियम व मैग्नेशियम की अधिकता के कारण यहां मिट्टी लवणीय तथा कैल्शियम व पौटेशियम की अधिकता के कारण क्षारीय हो गई है। अतः यह खेती के लिए उपयुक्त नहीं है। इन्हें स्थानीय भाषा में रेह, कल्लर, रकार, ऊसर, कार्ल, चाॅपेन आदि कहा जाता है।

8. पीट एवं दलदली मिट्टियां

इस प्रकार की मिट्टी का निर्माण अत्यधिक आर्द्रता वाली दशाओं में बड़ी मात्रा में कार्बनिक तत्वों के जमाव के कारण होता है। यह मुख्य रूप से तटीय प्रदेशों एवं जल-जमाव के क्षेत्रों में पायी जाती है। इसमें घुलनशील लवणों की पर्याप्तता होती है, परन्तु फास्फोरस व पोटाश की कमी रहती है। यह मिट्टी खेती के लिए अनुपयुक्त है। फेरस आयरन होने के कारण इसका रंग नीला होता है। यह अम्लीय स्वभाव की मृदा होती है। इस प्रकार की मृदा बिहार, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा व तमिलनाडु में मिलती है।

मिट्टी की उर्वरता में कमी का कारण

पोषक तत्वों का ह्रास

निक्षालन - भारी वर्षा के कारण

अपरदन - उर्वरतायुक्त मिट्टी की सतह का ह्रास

कृषि भूमि का अति-उपयोग

दोषपूर्ण कृषि प्रबंधन

भारत की मिट्टियों में सामान्यतः नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश की कमी होती है। इसके लिए कार्बनिक खादों व उर्वरकों का उपयोग किया जाता है। चक्रीय कृषि, मिश्रित कृषि आदि से मिट्टी की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

देश में मृदा अपरदन व उसके दुष्परिणों पर नियंत्रण हेतु सन् 1953 में केन्द्रीय मृदा संरक्षण बोर्ड का गठन किया गया, जिसका कार्य राष्ट्रीय स्तर पर मृदा संरक्षण के कार्यक्रमों का संचालन करना था।

मरूस्थल की समस्या के अध्ययन के लिए जोधपुर में काजरी(Central Arid Zone Research Institute - CAZRI) की स्थापना की गई है।

19 फरवरी, 2015 को राजस्थान के सूरतगढ़ से मिट्टी की खराब गुणवत्ता की जांच करने और कृषि उत्पादकता बढ़ाने हेतु ‘मृदा स्वास्थ्य कार्ड’ योजना की शुरूआत की गई। इस योजना पर 75 प्रतिशत राशि केंद्र सरकार वहन करेगी। इस योजना का ध्येय वाक्य ‘स्वस्थ धरा, खेत हरा’ है। प्रत्येक 3 वर्ष पर कार्ड का नवीनीकरण होगा।

तथ्य

मिट्टी का रंग मैग्नीशियम की अधिकता के कारण पीला होता है।

मालाबार तट पर ‘केरल के पश्च जल’ में पाई जाने वाली पीट मृदा को ‘कारी’ कहते हैं।

फलों को शीघ्र पकाने में ‘फाॅस्फोरस’ की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

वायुमंडल के नत्रजन का स्थिरीकरण करने वाली दलहनी फसलें चना, मटर, मूंग आदि हैं।

परत अपरदन को ‘किसान की मौत’ भी कहा जाता है।

चम्बल नदी क्षेत्र अवनालिका अपरदन से सर्वाधिक प्रभावित है।

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